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शनिवार, 29 मार्च 2014

जिन्दगी मैं ...

















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जिन्दगी मैं ... 
बड़े ही अजीब होते हैं ... रिश्ते और रास्ते ...
अजनबी से लोग ... अनजाने से मोड़ पर ... अपने बन जाते हैं ...
खासम ख़ास अपने ... दावा ऐ दोस्त ... 
उन्ही रास्तों से ... बिछुड़ कर ... दूर चले जाते है ...
मिलने पर खुशी ... बिछड़ने पे गम ... क्या खूब ... 
रास्तों पे ... रिश्ते निभाते हैं .

जिन्दगी मैं ... 
बड़े ही अजीब होते हैं ... रिश्ते और रास्ते ...

#सारस्वत
29032014

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

आसरे दिल जान के

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जान गर है जान में तो , आसरे दिल जान के
दिल के तार दिलबर सुने , दुश्मन भले ही जान के

लम्बी श्याह पलकों तले , अश्कों का है समन्दर
डूब कर देखो कभी तो , गैहरी नजर तनजान के

गुंचायेदिल खो गया , पतझड़ की इस बहार में
बेज़ान सा होगया दिल , मरहूम हमको जान ने

और कब तलक बैठे रहें , यूँ आईने के सामने
दोनों तरफ हम हैं मगर , फ़ासले दिलों जान के

#सारस्वत
28032014 

सोमवार, 24 मार्च 2014

दीवारों की दरारों से












#
छोड़ दिया जिसको , तन्हां जमाने में
क्यूँ लपेटे हो , उसको खुदके फ़सानों में
दीवारों की दरारों से , जाले ना हटाओ
मैं धड़कता हूँ , अभी भी कैदखानों में
बाहर किया जिसे , बहार आने से पैहले
नाम लिक्खो ना , उसका दीवानों में
इश्क के समन्दर में , डुबोगे तो जानोगे
कितने मोती हैं , इसके आशियानें में
आवाजे गूंजती हैं , यादों के जंगल में
रौशनी ढूंढो ना , तन्हा मुसाफिरखाने में
#सारस्वत
24032014 

रविवार, 23 मार्च 2014

शुभदिनसुन्दरहो

















#
हे मनुष्य
आंसुओं की आवाज क़मजोर बना देती है 
तू मुझसे दया की भीख नहीं शक्ति मांग.
हे विदवान ! 
तू अपना कर्म कर......... परमाण के साथ
बाक़ी......सब मुझ पर छोड़ दे परिणाम के साथ
जैसे.....
सरग़म की आवाज भी सुनाई दे जाती है
जैसे.....
अनुराग का भाव भी दिख़ाई दे जाता है
वैसे .....
एक बालक दौड़ लगा कर अपने पिता की गोद में चढ़ जाता है
फिर आना.....
कर्मशील ऊष्मा से भरपूर ख़ुद पर से भरोसा
मनोभाव के साथ
मन क़ी बातो के साथ
#सारसवत

24032014









#

आज़ाद भारत की , जिन्दा सी ख्वाईश आज भी है
आज़ादी खुली हवा सी , मेरी फरमाईश आज भी है
जिसके लिए कुर्बानियां दे दी , क्रांति रथ वीरों ने
उसी फलक को , रिहाई का इन्तजार आज भी है
मेरे माथे से , गुलामी की सियाही छूटती ही नही
मेरे सर को , इस हकीकत का मलाल आज भी है
चले थे हमवतन , हिन्दुस्तानियों की शक्ल में
लेकिन हिन्दू मूरों की बस्तियां , यहाँ आज भी हैं
दिलों के बीच में , मोहब्बत नही नफरत पलती है
खंजर सीनों में उतरने के लिए , बेताब आज भी है
दाग चहरों पर कितने हैं , गिनती करना मुश्किल
नस्लें गुजर गई , पहले दंगे का असर आज भी है
#सारस्वत
23032014 

शनिवार, 22 मार्च 2014

छुपा है चाँद तो

#
छुपा है चाँद तो नजर आ ही जायेगा
आखिर कब तलक वो दूर रैह पायेगा
छुपा है चाँद तो  ....
मर कर भी ज़िंदा हो जाये वही इश्क
ज़िंदा रैहन को झोली फैला के आएगा
प्यार के आसमान में बिखरी है खुशबु
कौन है जो इस कैद से बचा रैह जायेगा
छुपा है चाँद तो  ....
गरूर ऐ इश्क बाज़ार में बिकता नहीं
फासला कितना भी हो लौट के आएगा
यादे समंदर में डुबकियां ना लगा ऐसे
दिल का दरवाजा सुबकता रैह जायेगा
छुपा है चाँद तो  ....
सजाया है सांसों ने यूँ बंदगी की तरहा
जिंदगी की सजा को दिल ही सजायेगा
पैमाने से भरी दोनों आँखों की कसम
ज़माना भी ये मंज़र देखता रैह जायेगा
छुपा है चाँद तो  ....
#सारस्वत
04122013 
















#
मजबूरी का नाम महात्मा गांधी
बचपन से सुनता आया हूँ लेकिन कब रजिस्टर्ड हुआ पता नहीं ,
नेहरू की प्रदर्शनी गांधी हो गई
बाद में गांधी खानदानी डिवीजन हो गई किसीको मलाल नही
देश जोड़ने वाला नाम पटेल हुआ
पटेल अब स्टेचू ऑफ़ यूनिटी होगया , इस पर कोई सवाल नहीं
मौत का सौदागर नाम दिया
फिर भी मजबूती का नाम मोदी होगया , ये कमाल है के नहीं
केजरीवाल आईटम नम्बर होगया
आईटम डांसर बोला तो धरना देगा , फिर मत बोलना बताया नहीं
#सारस्वत
22032014 

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

#
साईकल से उतर कर राजू आ गया
बैंड बाजा लेके बप्पी लैहरी आ गया
हाथ हिलाता जगदम्बिका आ गया
साथ में सतपाल महाराज आगया
लालू के घर से राम कृपाल आ गया
रामविलास गिरगिट रंगीन आ गया
लहर है देश में आज मोदी के नाम की
आलू बैंगन तरकारी समभाव आ गया
#सारस्वत
21032014 

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

"इश्क का धरना"

#
इश्क नाम उस अराजकता का है
जिसका दावा है बदलाव आएगा
आहें भरते घर तक पीछा करना
ख़ुशफैहमी का समाजवाद लाएगा
हकीकत से रुबरु करेगा अगर कोई
दिल दीवाना धरने पर बैठ जायेगा
जात-पात का अड़ंगा मत लगाना
वरना ये मरने-मारने पे उतर आएगा
बेशर्मी का झंडा बुलन्दी को छुऐगा
तबेही कम्बख्त-इश्क कहलायेगा
धड़कनें फड़कती रहें दुआ करना
एक रोज़ इंकलाब जरुर आएगा
#सारस्वत
14032014

बुधवार, 12 मार्च 2014

"पिताजी"

#
एक दृढ व्यक्तित्त्व 
प्रकाशपुंज के समान 
पिताजी 
*
मेरे जीवन की पृष्ठभूमि
उच्च आदर्शों के प्रतिबिम्ब
व्यवहारिक प्रेरणाश्रोत
मेरे जीवन के मार्ग-दर्शक
पिताजी
प्रकाशपुंज के समान
पिताजी
*
जिंदगी की धूप की तपिश से
परिचय करवाना मात्र सख्ती
कडक आवाज के पीछे
मकसद मेरी स्थापना
पिताजी
प्रकाशपुंज के समान
पिताजी
#सारस्वत
12032014

सोमवार, 10 मार्च 2014

"नेताजी"


#
नेताजी
हमारे राजनीती के बड़े खिलाडी हैं
हर एक फण्डा आजमा कर देख लेते हैं
स्वार्थ सिद्धि का नाम ही तो है नेतागिरी
सारे जोड़ तोड़ वो बिठा कर देख लेते हैं
#
नेताजी तो
सियासत के मंजे हुऐ अर्थशास्त्री ठैहरे
राजनीतिक पल्टियाँ दूर से देख लेते हैं
चुनाव से ठीक पैहले तो जाती धरम का
हिसाब किताब भी फैला कर देख लेते हैं
#
नेताजी के
कितनी हवा है खिलाफत में सियासत में
सारा नुक्सान जोड़ घटा कर देख लेते हैं
जिसका साथ हो साथ में उसका हिसाब
नफे की किताब में बिठा कर देख लेते हैं
#
नेताजी को
बार बार दल बदलने का कोई शौक नहीं है
बस कुर्सी का शौक सत्ता का स्वाद लेते हैं
सियासत कुत्ती शै है ये बात खूब जानते है
इसीलिए तो इस महकमें को खुद देख लेते हैं
#सारस्वत
10032014 

शनिवार, 8 मार्च 2014

"स्त्री सम्मान"








#
एक दीप ज्ञान का, एक दीप ध्यान का
एक दीप आशा का, स्त्री सम्मान का
गहरी ऊष्मा से भरपूर , एक जलधारा
रेगिस्तान सहारा , गहरे नाभि-नाल का
ममतामई बिबं प्रतिबिंब , आदर्श प्रतिमा
एक सरोवर , चिर नवीन प्रार्थनाओं का
पूर्वाग्रहों से मुक्त , एक चुपचाप  सड़क
ह्रदयस्पर्शी रूपअन्नंत , संवेदनाओं का
ग्रह-नक्षत्रों पर , एक बूंद की तलाश में
जीवन खपा देने वाली , एक प्यास का
एक दीप विश्वास का , जीव पहचान का ,
एक दीप आशा का, स्त्री सम्मान का,
#सारस्वत
08032014 

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

महिला "उम्मींद के आँसू" दिवस

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चटकने की आवाज ' पथरीले शब्दों से.....
उखड़ती सांसों पे ' तयशुदा निशानों से.......
हम हैं प्रतीक्षा में , नींद में ऊँघते..
चलो नोच डालते है उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
#
विद्रोह के नक़्शे ... स्मृतियों की वर्जनाएं '
घर की सीलन... मुखर आर्तनाद ;
जाल में फंसे … छटपटाते शिकार ,
भेद डाले - दूब चिन्ह ,
तोड़ डाले - लज्जा के भाव '
चलो नोच डालते है उम्मीदें ...
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
#
छातीयों को पीटते ' उच्च स्वर विलाप...
भाषा के विलोपन में ' भाषा का चमत्कार ;
बातें सी सीढियां , शब्दों सी आग ...
तिलिस्मी सी रचनाऐं ...
सब अय्यारी ..प्रभाव ,
चलो नोच डालते है उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
#
रेत ग़या , वह स्वर्ण युग...
मौन मुखर शब्द तलवार , ज्वाला शस्त्रागार ...
बातें जों बदलतीं ' चित्रों सी , मनमाफिक रंगों सी...
बंद कर दिए - मरुथली रास्तों के छोर.......
ढांप दिए उजालों के - तमाम रोशनदान........
चलो नोच डालते है उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
#
चलो ओढ़ लेते हैं - हम भी मातमी लिबास
जिनके सुर मिलते हैं ..ठहाकों , सलीबों से '
शोकगीत..गातें हैं , झुके सिर पर मुस्कुराते हैं ;
क्षुब्ध ज्वालाओं क़ा तर्पण करते हैं.......
चलो कुछ देर और वेश बदलते हैं..........
चलो नोच डालते है उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
#
समय हुआ - तो भूल गए रिश्ता
समय हुआ - तो साथ गए बंधे रिश्ते जैसा
मुझमें काँटे उगते हैं - केवल उसको चुभते हैं
रहा बंधा रिश्ता खूंटे के जैसा .....
मेरा जीवन चौपाये जैसा
चलो नोच डालते है उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
#
खुली किताब के ये कुछ सबूत , खारे पानियों में बहा देते हैं ;
उलझी व्यस्तताओं की लटों में , राहत की चंद सांस लेते है......
खुली आँखों से रखते हैं ; दो मिनट के प्रायोजित मौन '
और... फिर ' गर्वित सहलाते हैं - पुनर्जीवन के चिन्ह
शवयात्रा के वैभव का गुणगान...... 'पीड़ा के आख्यान'
चलो नोच डालते हैं बची उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
#सारस्वत
07032014