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रविवार, 12 जुलाई 2015

बारिश के मौसम में




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मैंने पूछा गगन से आज दिन नहीं निकला 
वो हसकर बोला बस उजाला नहीं निकला 

लगता है मौसम आज बारिश का देख कर 
भीगने के डर से सूरज घर से नहीं निकला  

मुंह चिड़ाने लगे मेरा रस्सी पर लटके कपड़े 
जब छतरी को लेकर मैं आँगन में निकला 

गली में देखा छोटे बच्चे चिल्लाये जा रहे थे 
कागज़ की नाँव का देखो मौसम आ निकला

कच्ची दीवारों में फिर आकर बैठ गया है डर 
जबसे सुना है बादल फिर पानी लेकर निकला 

पहली बारिश में ही समुन्दर बन गया है शहर 
कश्तियाँ उतारो सड़क पर है रस्ता नया निकला 
#सारस्वत 
12072015 

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

अक्सर अँधेरी रातों में

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यहां मैं और वहां चाँद
अक्सर अँधेरी रातों में
चाय की प्यालियों में डूबकर
जागा करते हैं रात भर
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कभी तोड़ते हैं खुशियों की गुल्लक
बाँट लेते हैं खुशियाँ आधी-आधी
अश्क़ों की बारिश में कभी कभी 
तकियों को नम करते हैं भिगोकर 
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हँसते हैं , गाते हैं , गुनगुनाते हैं
और कभी-कभी शरमाते भी हैं
यूँ ही एक दूसरे की बातों में
बिता देते हैं रात सारी घर से बेघर
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दुश्मन हैं लेकिन सुबह की किरणें
कर देती हैं हम दोनों को अलग 
चाँद छुप जाता है कहीं बादलों में
फिर मिलने का वादा लेकर देकर
#सारसवत
30082012 

शनिवार, 4 जुलाई 2015

टूटती सांसों के साज़

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टूटती सांसों के साज़ 
रात की तन्हाई में सुनाई देते हैं 
दिल के धड़कने की आवाज़
जब कोई सुनने वाला नहीं होता 

तारों सितारों का रुआब भी 
उम्मीद का दीदार नहीं कराता 
सन्नाटा चीर कर जाता है 
जब नज़ारे सब डूब जाते हैं 

खामोशी ठहर जाती है आँगन में 
मातम पसर जाता है दामन में 
जिसवक़्त वक़्त की बदली पर 
पतझड़ का मौसम झूम के आता है 

वीरानियाँ लेती हैं अंगड़ाई 
ख्वाइशें दम तोड़ने लगती हैं 
जब सोई हुई यादें पलटकर 
अचानक ज़ख्म उधड़े दिखाती हैं 

पलकों से छलक कर दो आंसू 
बंद हो जाती हैं सदा के लिये 
दम तोड़ देती है जिंदगी 
मौत शहनाई बजाती है 
#सारस्वत 
04072015