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शनिवार, 31 दिसंबर 2016

दिन नया होता है








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दिन प्रतिदिन दिन नया होता है 
छण प्रतिछण छण नया होता है 
दिन प्रतिदिन  ... 
चक्रसुदर्शन सा जनन रचना चक्र 
पल प्रतिपल आयाम नया छूता है 
प्रभात की किरणें उमंगे लहरें तरंगें 
उदभव होती हैं तो मनमयूर होता है 
दिन प्रतिदिन  ... 
रूचि सुरुचि प्रज्ञा सृजन ज्ञानतंत्र  
मनभावन स्वरसंगम नया होता है  
चित्त चितवन में मनन मंथन में 
प्रजनन उत्सर्जन उद्गम नया होता है 
दिन प्रतिदिन  ... 
अंश से वंश तक धरा से गगन तक 
पुरातन कोई जाता है नूतन कोई नया आता है 
युगों युगों से जन्मोजन्म तक चलायमान 
प्रकृति का प्रकति से संवाद यही होता है 
दिन प्रतिदिन ... 
दिन नया होता है 
दिन प्रतिदिन ... 
दिन नया होता है 
#सारस्वत 
01012017 

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई ... शिकवा ... तो नहीं ...

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कुछ दिन पहले रजनीश भाई मेरे पास
तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई  ... शिकवा  ... तो नहीं ...
आंधी फ़िल्म के गुलज़ार जी के लिखे गीत को लेकर आये और दो अलग अंतरे लिखने को कहने लगे , पहले मैंने उनकी बात को मज़ाक समझा मगर रजनीश भाई जोर देकर कहने लगे लिखने ही पड़ेंगें मैंने कहा मेरे आदर्श हैं उनकी लेखनी की धार के पर जाना मुमकिन ही नहीं नामुमकिन है , लेकिन वह ज़िद पर अड़े रहे ऐसे में मेरे जैसे नासमझ से जो बन पड़ा वह आज यह लिख आप सभी के समक्ष लिखने की धृष्टता कर रहा हूँ । उम्मीद करता हूँ मेरी इस गलती को गुलज़ार जी उदंड शिष्य समझकर माफ़ करेंगें #सारस्वत
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तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई  ... शिकवा  ... तो नहीं ...
शिकवा ..नहीं ... शिकवा नहीं ...शिकवा नहीं ...
तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन , ज़िन्दगी  ... तो नहीं,
ज़िन्दगी  .. नहीं  ... ज़िन्दगी नहीं ...
तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई ...  शिकवा  ...
*
कोहरा फैला है  ...
धुआं शक्लें हैं  ... लिपटी हैं यादें तेरी
आता  ... नज़र कुछ नहीं
तन्हां सी रातों में  ...
चुभती सी यादें की
साथ   ...हैं बातें तेरी
तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई  ... शिक़वा  ...
शिकवा ..नहीं ... शिकवा नहीं ...शिकवा नहीं ...
*
तुमको देखा तो  ...
चश्में उल्फ़त के  ... खुद से रौशन हुए
ख्वाइशें  ...फिर  ज़िंदा हुई
लकीरें हाथों की  ....
हाथों से मिलकर भी
मिलती क्यों नहीं
तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई  ... शिक़वा तो नहीं
शिकवा ..नहीं ...
#सारस्वत
18122016

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

उम्र के ...साथ में ...

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उम्र के  ...साथ में
बाल  ... पक गए
लक़ीरें  ... हाथों की
चेहरे पर  ... खिंची
बालपन से निकला
तो  ...  बड़ा हो गया
मैं भी  ... वही हूँ
मेरा  ... रास्ता भी वही
मगर ,
नज़रिया मेरा  ...
अब ,
बदल सा  ... गया है
पहले मैं ,
कल्पनाओं में  ... जीता था
हक़ीक़त की  ... ज़मीन पर
अब   ... मैं खड़ा हूँ
पहले ,
मैं  ... बेफ़िक्र बेटा था
अब ,
फिक्रमंद बाप हूँ
#सारस्वत
08122016 

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

राष्ट्रगान का सम्मान जीत गया

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बात 14 साल पुरानी है ... 
लेकिन "श्याम नारायण चौकसी" के बारे में 
बात शुरू करने से पहले उसका यहां जिक्र करना ज़रूरी है 
हाँ तो बात 2002 [भोपाल] की है 
"श्याम नारायण चौकसी" एक थेयटर में मूवी देखने गए
फ़िल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान शुरू हुआ तो
.दर्शकों के बीच बैठे "श्याम नारायण चौकसी" खड़े हो गए
उनको खड़ा हुआ देखकर वहां बैठे हुए बाकी लोग
उनकी मजाक उड़ाने लगे ... जोर जोर से हंसने लगे
किसीने सज्जन ने तो कागज के टुकड़े भी उनके सर पर दे मारे
लेकिन "श्याम नारायण चौकसी" अडिग इरादे के साथ खडे रहे
वहां से निकलकर "श्याम नारायण चौकसी" सुप्रीम कोर्ट गए
और 14 साल तक राष्ट्रगान के सम्मान की लड़ाई लड़ते रहे
आखिर में जीत सम्मान की हुई राष्ट्रीयगान की हुई
"श्याम नारायण चौकसी" जीत गए
जब सुप्रीमकोर्ट ने पूरे देश में यह फैसला अनिवार्य किया
#राष्ट्रगान_बजेगा ... तो .... #सम्मान _में_खड़ा_होना_पड़ेगा"
राष्ट्रगान सम्मान के लिए
लम्बी लड़ाई लड़ने वाले ... "श्याम नारायण चौकसी" जी को वन्दन
जयहिंद ...
वन्देमातरम ...
#सारस्वत
02122016